अनोखी रामलीला: 115 साल से लगातार, 25 साल से एक ही रावण

विदिशा में 1901 में पहली बार रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। तब से अब तक यह रामलीला हर साल मकर संक्राति के दिन से शुरू होती है।

आजादी की लौ जलाने और लोगों का भगवान पर भरोसा बनाएं रखने के लिए 1901 में पहली बार विश्वनाथ प्रसाद शास्त्री ने विदिशा में रामलीला शुरू थी। वक्त बदल गया, हालात बदल गए लेकिन रामलीला आज भी जारी है। आमतौर पर हम दशहरा में रामलीला होने की बात जानते हैं लेकिन विदिशा में मकर संक्राति से रामलीला शुरू होती है। आपको बता दें कि इस रामलीला का मंचन नहीं होता, क्योंकि ये खुले मैदान में होती है न कि मंच पर

पहली बार बनाया अपना संविधान
यह देश की पहली ऐसी रामलीला समीति है जिसका अपना संविधान है। इस रामलीला के बारे में मप्र के गेजेटियर में भी जिक्र किया गया है। रामलीला की खासियत यह है कि आजादी के पहले से ही इसका अध्यक्ष जिले के कलेक्टर को बनाया जाता है। यह प्रथा आज भी जारी है। आजादी के पहले रामलीला के दौरान पूरा कलेक्ट्रेट यानि सूबा मैदान में ही तैनात रहता था। कलेेक्टर और पुलिस विभाग की सभी कार्रवाई यहीं से पूरी की जाती थीं। हालांकि अब ऐसा नहीं है।

छोड़ देते हैं परिवार
लगभग 25 साल से रावण का किरदार निभा रहे जगदीश नारायण शर्मा कहते हैं कि मैं रामलीला के लिए एक माह तक पूरी शिद्दत से काम करता हूं। इस दौरान परिवार से भी बातचीत नहीं होती। हनुमान का किरादार निभाने वाले क्षत्रपाल शर्मा भी यही रूटीन अपनाते हैं। पूरे एक माह तक परिवार से दूर केवल हनुमान के किरदार को आत्मसाध किए हुए दिन व्यतीत करते हैं।


मंच पर नहीं मैदान में उतरते हैं किरदार
इस रामलीला की खास बात यह है कि 115 सालों से यह रामलीला एक ही स्थान पर आयोजित हो रही है। विदिशा के स्टेडियम में रामलीला के लिए कोई विशेष मंच नहीं बनाया जाता। बल्कि यहां तीन ंमंजिला अयोध्या भवन और उसके ठीक सामने रावण की लंका की पक्की इमारत बनी है। रामलीला में किरदार निभाने वाले कोई थियेटर आर्टिस्ट नहीं बल्कि हमारे बीच के ही लोग हैं। जानकारी के अनुसार विगत कई सालों से रामलीला में प्रोफेसर, समाजसेवी, स्थानीय नेता, डॉक्टर और इंजीनियर भाग ले रहे हैं। यह पूरी टीम पुरूषों की है, यहां तक की सीता और अन्य महिला किरदार भी पुरूष निभाते हैं। अच्छी बात यह है कि सभी कलाकार नि:शुल्क इस लीला का हिस्सा बनते हैं, इनमें से कोई भी काम करने के लिए मानदेय नहीं लेता


नेचुरल होता है मेकअप
रामलीला के कलाकारों को सजाने का जिम्मा विश्वेवर शर्मा और मनमोहन शर्मा का है। वे कलाकारों को तैयार करने के लिए नेचुरल रंगों का इस्तेमाल करते हैं। इन रंगों का इस्तेमाल दशकों से हो रहा है। कोई भी कलाकार आर्टिफिशयल मेकअप यूज नहीं करता। यहां तक की आज भी पुराने समय में तैयार किए गए कॉस्ट्यूम यूज किए जाते हैं।


कभी गधे पर आती थी सेना
रावण के सैनिक शहर के बीच से गुजरा करते थे और राम की सेना से युद्ध करते थे। लेकिन समय से साथ इस अंश में बदलाव किए गए और अब गधों की जगह घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। पालकी, रथ और हाथी थी सेना का हिस्सा होते हैं। रामलीला देखने के लिए हजारों दर्शक  रोजाना पहुंचते हैं लेकिन रावण वध के दिन लगभग 50 हजार दर्शक मैदान में पहुंचते हैं।

 

दो बार जलता है रावण
आमतौर पर रावण दशहरा के दिन जलाया जाता है लेकिन विदिशा में दोबार रावण दहन होता है। दशहरा के अलावा मकर संक्राति से शुरू होने वाली इस रामलीला का रावण 4 फरवरी को जलाया जाता है। रावण की ऊंचाई 40 फीट होती है। रावण के साथ मेघनाद, कुभंकरण, ताणका समेत अन्य राक्षसों के पुतले भी जलाए जाते हैं। यह परंपरा आज भी निरंतर जारी है

 

 

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