कार्य- स्थल

श्री रामलीला मेला समिति विदिशा

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धर्म की अधर्म पर शाश्वत 

रामलीला के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्श, त्याग और सत्य के मार्ग को जीवंत रूप में देखें। यह दिव्य प्रस्तुति न केवल एक नाटक है, बल्कि आस्था, संस्कृति और सद्भाव का अनुपम संगम है, जो हर हृदय को प्रेरित करता है।

रामलीला समिति में आपका स्वागत है

विदिशा में 1901 में पहली बार रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। तब से अब तक यह रामलीला हर साल मकर संक्राति के दिन से शुरू होती है। आजादी की लौ जलाने और लोगों का भगवान पर भरोसा बनाएं रखने के लिए 1901 में पहली बार विश्वनाथ प्रसाद शास्त्री ने विदिशा में रामलीला शुरू थी।…

श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा आप सभी का हार्दिक स्वागत करती है।

श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा आप सभी श्रद्धालुओं एवं दर्शकों का हार्दिक स्वागत करती है। यह समिति वर्षों से रामलीला की पावन परंपरा को सहेजते हुए धर्म, संस्कृति और आस्था का संदेश जन-जन तक पहुँचाती आ रही है। ऐतिहासिक विरासत और अनुशासित परंपराओं के साथ आयोजित यह रामलीला केवल एक मंचन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है, जिसमें भाग लेकर दर्शक स्वयं को आध्यात्मिक अनुभव से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

विदिशा में 1901 में पहली बार रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। तब से अब तक यह रामलीला हर साल मकर संक्राति के दिन से शुरू होती है। आजादी की लौ जलाने और लोगों का भगवान पर भरोसा बनाएं रखने के लिए 1901 में पहली बार विश्वनाथ प्रसाद शास्त्री ने विदिशा में रामलीला शुरू थी।…

यह रामलीला समिति अपने आप में एक ऐतिहासिक पहचान रखती है। यह देश की उन विरल रामलीलाओं में से एक है, जिनकी कार्यप्रणाली लिखित नियमों और परंपराओं से संचालित होती है। स्वतंत्रता से पूर्व स्थापित इसकी परंपराएँ आज भी उसी गरिमा के साथ निभाई जा रही हैं। विशेष बात यह है कि समिति का अध्यक्ष पद सदैव जिले के कलेक्टर के पास रहा है, जो इसकी निष्पक्षता और प्रशासनिक गरिमा को दर्शाता है। इस रामलीला का उल्लेख मध्यप्रदेश के गजेटियर में भी मिलता है, जो इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को प्रमाणित करता है।

इस रामलीला की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ पात्र केवल मंच पर अभिनय नहीं करते, बल्कि पूरे मैदान में उतरकर कथा को जीवंत कर देते हैं। विशाल मैदान ही इसका मंच बन जाता है, जहाँ हर दृश्य वास्तविकता का आभास कराता है। दर्शक स्वयं को कथा का हिस्सा महसूस करते हैं और रामायण की घटनाएँ मानो उनकी आँखों के सामने सजीव हो उठती हैं। यही कारण है कि यह रामलीला एक नाटक नहीं, बल्कि एक अद्भुत जीवंत अनुभव बन जाती है।

आमतौर पर रावण का दहन दशहरा के दिन किया जाता है, लेकिन विदिशा की रामलीला में यह परंपरा कुछ अलग और विशिष्ट है। यहाँ रावण का दहन दो बार होता है। दशहरा के बाद मकर संक्रांति से आरंभ होने वाली इस रामलीला में दूसरा रावण दहन 4 फरवरी को किया जाता है। लगभग 40 फीट ऊँचा रावण दर्शकों के आकर्षण का केंद्र होता है। रावण के साथ-साथ मेघनाद, कुंभकर्ण, ताड़का सहित अन्य राक्षसों के पुतलों का भी दहन किया जाता है, जो अधर्म के संपूर्ण अंत और धर्म की विजय का प्रतीक है।

पहले रावण की सेना शहर के बीचों-बीच से होकर गुजरती थी और वहीं राम की सेना से प्रतीकात्मक युद्ध होता था। यह दृश्य पूरे नगर को रामलीला का मंच बना देता था। समय के साथ सुरक्षा और व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इस अंश में बदलाव किए गए। अब गधों के स्थान पर घोड़ों का उपयोग किया जाता है। सेना में पालकियाँ, रथ और हाथी भी शामिल होते हैं, जो दृश्य को और भव्य बनाते हैं। इस ऐतिहासिक और अनूठी रामलीला को देखने के लिए हर वर्ष हजारों दर्शक दूर-दूर से विदिशा पहुँचते हैं।

समिति के पदाधिकारीगण

समिति के पदाधिकारी रामलीला की गौरवशाली परंपरा को सुचारु रूप से संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारी मिलकर आयोजन की व्यवस्था, अनुशासन और गरिमा को बनाए रखते हैं। इनके समर्पण, सहयोग और सेवा भावना से ही श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा वर्षों से अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है।

ऐतिहासिक रामलीला मंच

छायाचित्र संग्रह

छायाचित्र संग्रह के माध्यम से श्रीराम लीला मेला, विदिशा के ऐतिहासिक और भव्य पलों को संजोया गया है। यह संग्रह रामलीला के विविध प्रसंगों, परंपराओं और सांस्कृतिक झलकियों को दर्शाता है, जो वर्षों से इस आयोजन की गरिमा और महत्त्व को जीवंत बनाए हुए हैं।

वीडियो संग्रह

इस वीडियो संग्रह में श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा द्वारा आयोजित रामलीला एवं संबंधित वार्षिक कार्यक्रमों के प्रमुख एवं स्मरणीय क्षणों को संकलित किया गया है। इसमें रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन, धार्मिक अनुष्ठान, शोभायात्राएँ, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ तथा मेले की समग्र गतिविधियाँ सम्मिलित हैं। यह वीडियो संग्रह कार्यक्रम की भव्यता, कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुति और श्रद्धालुओं की आस्था को सजीव रूप में प्रदर्शित करता है तथा भविष्य में स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

डोल ग्यारस पर्व भादौ मास के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन मनाया जाता है। कृष्ण जन्म के 11वें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को ‘डोल ग्यारस’ के रूप में मनाया जाता है। जलवा पूजन के बाद ही संस्कारों की शुरुआत होती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को डोल में…

अक्षय नवमी (अंग्रेज़ी: Akshaya Navami) कार्तिक शुक्ला नवमी को कहते हैं। अक्षय नवमी के दिन ही द्वापर युग का प्रारम्भ माना जाता है। अक्षय नवमी को ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्ड[1] का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड का पूजन करना चाहिये। विधि विधान से तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान तुल्य फल मिलता है।

 कार्यक्रम

कार्यक्रम के अंतर्गत श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा द्वारा आयोजित यह रामलीला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी सशक्त माध्यम है। इस आयोजन में विधिवत पूजन, हवन, शोभायात्रा एवं धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से वातावरण को पावन बनाया जाता है। रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ किया जाता है। स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ अनुभवी पात्रों की सहभागिता कार्यक्रम को और भी प्रभावशाली बनाती है। रामलीला के दौरान भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देती हैं। यह आयोजन समाज में नैतिक मूल्यों, सदाचार और मर्यादा के भाव को प्रोत्साहित करता है। मेला परिसर में विविध सांस्कृतिक एवं पारंपरिक गतिविधियाँ जनमानस को आकर्षित करती हैं। यह कार्यक्रम बच्चों और युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। रामलीला मेला समिति द्वारा किया गया यह प्रयास सामाजिक समरसता और भाईचारे को मजबूत करता है।इस आयोजन से विदिशा की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक गौरव को नई ऊर्जा मिलती है।

भविष्य की योजनाएँ

श्रीराम लीला मेला समिति भविष्य में परंपरा, आधुनिकता और युवा सहभागिता के साथ रामलीला को और भव्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था।

धार्मिक पुस्तकालय का सन्चालन

प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था।

वृद्धा आश्रम निर्माण

श्री राम चरित मानस अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा १६वीं सदी में रचित एक महाकाव्य है। इस ग्रन्थ को हिंदी साहित्य की एक महान कृति माना जाता है। इसे सामान्यतः ‘तुलसी रामायण’ या ‘तुलसीकृत रामायण’ भी कहा जाता है।

मानस भवन निर्माण

श्रीराम लीला मेला समिति, विदिशा आप सभी के सहयोग और सहभागिता के लिए कृतज्ञ है तथा आगे भी इसी आत्मीयता के साथ आपका स्वागत करती रहेगी।

किसी भी जानकारी, सुझाव या सहयोग के लिए आप हमसे निःसंकोच संपर्क कर सकते हैं। हम आपकी सेवा के लिए सदैव तत्पर हैं।